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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.100.13 
स देवराजसदृशो धर्मज्ञ: सत्यवागृजु:।
दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वह देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी, धर्मात्मा, सत्यवादी और सरल था। दान, धर्म और तप के संयोग से उसे दिव्य उन्नति प्राप्त हो रही थी। 13॥
 
He was mighty, religious, truthful and simple like Devraj Indra. Due to the combination of charity, religion and penance, he was experiencing divine growth. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)