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mahabharat 1.100.11: क्षत्रिय ब्राह्मणों की सेवा करते थे, वैश्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों से प्रेम करते थे, तथा शूद्र ब्राह्मणों और क्षत्रियों से प्रेम करते हुए भी वैश्यों की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे।   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.100.11 
ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विश: क्षत्रमनुव्रता:।
ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्रा: पर्यचरन् विश:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय ब्राह्मणों की सेवा करते थे, वैश्य ब्राह्मणों और क्षत्रियों से प्रेम करते थे, तथा शूद्र ब्राह्मणों और क्षत्रियों से प्रेम करते हुए भी वैश्यों की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे।
 
The Kshatriyas served the Brahmins, the Vaishyas were fond of the Brahmins and Kshatriyas, and the Shudras, while having affection for the Brahmins and Kshatriyas, were always ready to serve the Vaishyas. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)