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mahabharat 1.100.101: सब राजा मिलकर और अलग-अलग उसके इस कठिन पराक्रम की प्रशंसा करने लगे और एक स्वर में कहने लगे - 'यह राजकुमार सचमुच भीष्म है।'॥101॥   |   mahabharat अध्याय 1.100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 100: शान्तनुके रूप, गुण और सदाचारकी प्रशंसा, गंगाजीके द्वारा सुशिक्षित पुत्रकी प्राप्ति तथा देवव्रतकी भीष्म-प्रतिज्ञा  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  1.100.101 
तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपा:।
समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन्॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
सब राजा मिलकर और अलग-अलग उसके इस कठिन पराक्रम की प्रशंसा करने लगे और एक स्वर में कहने लगे - 'यह राजकुमार सचमुच भीष्म है।'॥101॥
 
All the kings started praising his difficult feat together and individually. All of them said in one voice, 'This prince is indeed Bhishma'.॥101॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)