श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 7: भगवद्ज्ञान  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.5 
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
हे महाबाहु अर्जुन! इनके अतिरिक्त मेरी एक और श्रेष्ठ शक्ति है, जिसमें वे जीव सम्मिलित हैं जो इस भौतिक, निम्न प्रकृति के साधनों का शोषण कर रहे हैं।
 
O mighty-armed Arjuna, besides these I have another supreme power which is composed of those living entities who are exploiting the means of this material lower nature.
तात्पर्य
यहाँ यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि जीवित संस्थाएँ परम भगवान की श्रेष्ठ प्रकृति (या ऊर्जा) से संबंधित हैं। निम्न प्रकृति पदार्थ है जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार जैसे विभिन्न तत्वों में अभिव्यक्त होती है। भौतिक प्रकृति के दोनों रूप, स्थूल (पृथ्वी, आदि) और सूक्ष्म (मन, आदि), निम्न प्रकृति की उपज हैं। जीवित संस्थाएँ, जो विभिन्न उद्देश्यों के लिए इन निम्न ऊर्जाओं का दोहन करती हैं, परम भगवान की श्रेष्ठ ऊर्जा हैं, और इस ऊर्जा के कारण ही संपूर्ण भौतिक जगत कार्य करता है। ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति में तब तक कार्य करने की शक्ति नहीं है जब तक वह श्रेष्ठ ऊर्जा, जीवित संस्था द्वारा प्रेरित न हो। ऊर्जाएँ हमेशा ऊर्जावान द्वारा नियंत्रित होती हैं, और इसलिए जीवित संस्थाएँ हमेशा प्रभु द्वारा नियंत्रित होती हैं-उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे कभी भी समान रूप से शक्तिशाली नहीं होते, जैसा कि अविवेकी लोग सोचते हैं। जीवित संस्थाओं और प्रभु के बीच अंतर को श्रीमद्-भागवतम (10.87.30) में इस प्रकार वर्णित किया गया है:

अपरिमिता ध्रुवास् तनु-भृतो यदि सर्व-गतास्

तर्हि ना शास्यतेति नियमो ध्रुवं नेतरथा

अजनि च यन-मयं तद विमुच्य नियंत्र भवेत्

समं अनुजानतां यद मतम मत-दुष्टतया

"हे परम शाश्वत! यदि अवतारी जीवित संस्थाएँ आपके समान शाश्वत और सर्वव्यापी होतीं, तो वे आपके नियंत्रण में नहीं होतीं। लेकिन यदि जीवित संस्थाओं को आपके प्रभुत्व की मिनट ऊर्जाओं के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो वे एक बार में आपके सर्वोच्च नियंत्रण के अधीन हो जाते हैं। इसलिए वास्तविक मुक्ति जीवित संस्थाओं द्वारा आपके नियंत्रण में समर्पण पर निर्भर करती है, और वह समर्पण उन्हें खुश कर देगा। उस संवैधानिक स्थिति में ही वे नियंत्रक हो सकते हैं। इसलिए, सीमित ज्ञान वाले लोग जो अद्वैतवादी सिद्धांत की वकालत करते हैं कि ईश्वर और जीवित संस्थाएँ सभी मामलों में समान हैं, वास्तव में एक दोषपूर्ण और प्रदूषित राय द्वारा निर्देशित होते हैं।"

परम भगवान, कृष्ण, ही एकमात्र नियंत्रक हैं, और सभी जीवित संस्थाएँ उन्हीं द्वारा नियंत्रित होती हैं। ये जीवित संस्थाएँ उनकी श्रेष्ठ ऊर्जा हैं क्योंकि उनके अस्तित्व की गुणवत्ता सर्वोच्च के साथ एक और समान है, लेकिन वे शक्ति की मात्रा में प्रभु के समान कभी नहीं होते। स्थूल और सूक्ष्म निम्न ऊर्जा (पदार्थ) का दोहन करते समय, श्रेष्ठ ऊर्जा (जीवित संस्था) अपने वास्तविक आध्यात्मिक मन और बुद्धि को भूल जाती है। यह भूलना जीवित संस्था पर पदार्थ के प्रभाव के कारण है। लेकिन जब जीवित संस्था भ्रामक भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से मुक्त हो जाती है, तो वह मुक्ति या मुक्ति कहलाए जाने वाले चरण को प्राप्त करती है। भौतिक भ्रम के प्रभाव में, मिथ्या अहंकार सोचता है, "मैं पदार्थ हूँ, और भौतिक अधिग्रहण मेरे हैं।" उसकी वास्तविक स्थिति का एहसास तब होता है जब वह सभी भौतिक विचारों से मुक्त हो जाता है, जिसमें ईश्वर के साथ सभी मामलों में एक होने की उसकी अवधारणा भी शामिल है। इसलिए कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि गीता जीवित संस्था को कृष्ण की बहु-ऊर्जाओं में से केवल एक की पुष्टि करती है; और जब यह ऊर्जा भौतिक संदूषण से मुक्त हो जाती है, तो यह पूरी तरह से कृष्ण चेतन, या मुक्त हो जाती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)