श्रीमद-भागवतम (५.५.२) में कहा गया है कि यदि कोई वास्तव में मुक्त होना चाहता है तो उसे भक्तों की सेवा (महत-सेवां द्वारम आहुर विमुक्तेः) करनी चाहिए; लेकिन जो भौतिकवादी लोगों से जुड़ता है वह जीवन के सबसे अंधकारमय क्षेत्र (तमो-द्वारं योषितां संगि-संगम) की ओर जाने वाले मार्ग पर है। प्रभु के सभी भक्त इस पृथ्वी पर इसी उद्देश्य से आते हैं कि बंधी हुई आत्माओं को उनके भ्रम से मुक्त करें। निर्वैयक्तिकवादी यह नहीं जानते हैं कि सर्वोच्च भगवान के अधीनस्थ के रूप में अपनी संवैधानिक स्थिति को भूलना ईश्वर के कानून का सबसे बड़ा उल्लंघन है। जब तक किसी को उसकी अपनी संवैधानिक स्थिति में पुनः स्थापित नहीं किया जाता, तब तक सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझना या दृढ़ निश्चय के साथ उनकी अतिशय प्रेममयी सेवा में पूर्ण रूप से संलग्न होना संभव नहीं है।
