जो व्यक्ति मुझमें पूर्ण चेतना रखता है, वह मुझे समस्त यज्ञों और तपस्याओं का परम लाभार्थी, समस्त लोकों और देवताओं का परमेश्वर तथा समस्त जीवों का उपकारक और शुभचिंतक जानकर भौतिक दुखों से शांति प्राप्त करता है।
Knowing Me as the ultimate enjoyer of all sacrifices and austerities, the Supreme Lord of all the worlds and gods, the benefactor and well-wisher of all living beings, a man filled with the nectar of My thoughts gains peace from material suffering.
तात्पर्य
मायावी ऊर्जा की पकड़ में फ़ंसी शर्तबद्ध आत्माएँ भौतिक दुनिया में शांति पाने की इच्छा में काफ़ी बेचैन रहती हैं। लेकिन उन्हें शांति का फ़ॉर्मूला नहीं पता, जिसकी व्याख्या भगवद गीता के इस हिस्से में की गई है। शांति का सबसे बड़ा फ़ॉर्मूला तो बस यह है: भगवान कृष्ण सभी मानवीय गतिविधियों के लाभार्थी हैं। मनुष्यों को सब कुछ भगवान की पवित्र सेवा में अर्पित करना चाहिए क्योंकि वो सभी ग्रहों और वहाँ रहने वाले देवताओं के मालिक हैं। उनसे बड़ा कोई नहीं है। वे सभी देवताओं में सबसे महान हैं, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा। वेदों (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.7) ने परमेश्वर को इस तरह से वर्णित किया है: तम ईश्वराणां परमं महेश्वरं। भ्रम के झाँसे में, जीव अपनी सारी सर्वेक्षण क्षमता का स्वामी बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में उनका वर्चस्व भगवान की भौतिक ऊर्जा द्वारा किया जाता है। भगवान भौतिक प्रकृति के मालिक हैं, और शर्तबद्ध आत्माएँ भौतिक प्रकृति के कड़े नियमों के अधीन हैं। जब तक कोई व्यक्ति इन सच्चाइयों को नहीं समझता, तब तक दुनिया में शांति प्राप्त करना संभव नहीं है, व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से भी नहीं। यही कृष्ण चेतना का भाव है: भगवान कृष्ण सर्वोपरि शासक हैं, और सभी जीव, महान देवताओं सहित, उनके अधीन हैं। व्यक्ति केवल पूर्ण कृष्ण चेतना में संपूर्ण शांति प्राप्त कर सकता है। यह पाँचवाँ अध्याय कृष्ण चेतना की एक व्यावहारिक व्याख्या है, जिसे आमतौर पर कर्म-योग के रूप में जाना जाता है। कर्म-योग कैसे मुक्ति दे सकता है, इस बारे में मानसिक अटकलों का प्रश्न इसका उत्तर है। कृष्ण चेतना में काम करना प्रभु के पूर्ण ज्ञान के साथ प्रभु के रूप में काम करना है। ऐसा काम पारमार्थिक ज्ञान से अलग नहीं है। प्रत्यक्ष कृष्ण चेतना भक्ति-योग है, और ज्ञान-योग भक्ति-योग की ओर ले जाने वाला मार्ग है। कृष्ण चेतना का अर्थ है परम निरपेक्ष के साथ अपने संबंध के पूर्ण ज्ञान में काम करना, और इस चेतना की पूर्णता कृष्ण का पूर्ण ज्ञान है, या भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व। एक पवित्र आत्मा भगवान की अनन्त दास है, उनके एक अंश और भाग के रूप में। माया (भ्रम) पर अधिकार करने की इच्छा के कारण उसका माया के संपर्क में आना होता है, और यही उसके कई कष्टों का कारण है। जब तक वह भौतिकता के संपर्क में है, तब तक उसे भौतिक आवश्कताओं के अनुसार काम करना होगा। हालाँकि, कृष्ण चेतना व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन में लाती है, तब भी जब वह भौतिकता के अधिकार क्षेत्र में होता है, क्योंकि यह भौतिक दुनिया में अभ्यास द्वारा आध्यात्मिक अस्तित्व का जागरण है। व्यक्ति जितना उन्नत होता है, वह उतना ही भौतिकता के चंगुल से मुक्त हो जाता है। भगवान किसी के प्रति आंशिक नहीं हैं। सब कुछ कृष्ण चेतना में अपने कर्तव्यों के व्यावहारिक प्रदर्शन पर निर्भर करता है, जो व्यक्ति को सभी प्रकार से इंद्रियों को नियंत्रित करने और इच्छा और क्रोध के प्रभाव पर विजय पाने में मदद करता है। और जो व्यक्ति उपर्युक्त जुनूनों को नियंत्रित करते हुए कृष्ण चेतना में स्थिर रहता है, वह वास्तव में पारलौकिक अवस्था में रहता है, या ब्रह्म-निर्वाण। आठ गुना योग रहस्यवाद स्वतः ही कृष्ण चेतना में अभ्यास किया जाता है क्योंकि अंतिम उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास में उन्नति की एक क्रमिक प्रक्रिया है। लेकिन ये केवल भक्ति सेवा द्वारा पूर्णता की प्रस्तावना करते हैं, जो अकेले ही मनुष्य को शांति प्रदान कर सकती है। यह जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है।
इस प्रकार श्रीमद् भगवद्-गीता के अंतर्गत पाँचवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥