स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
अनुवाद
भगवान के साथ सम्बन्ध का वह अति प्राचीन विज्ञान आज मैं तुम्हें बता रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे भक्त होने के साथ-साथ मेरे मित्र भी हो, अतः इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो।
Today this same ancient Yoga, the science of one's relationship with God, is being told to you by me because you are my devotee and friend and hence you can understand the divine secret of this science.
तात्पर्य
पुरुष दो प्रकार के होते हैं, एक भक्त और दूसरा असुर। भक्त होने के कारण ही भगवान ने अर्जुन को इस महान् विज्ञान का अधिकारी बनाया। परंतु असुर को इस महान् रहस्यमय विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं है। इस महान ज्ञान के ग्रंथ के अनेक संस्करण है। कुछ पर भक्तों ने और कुछ पर असुरों ने टीका की है। भक्तों की की गई टीका सच्ची होती है, जबकि असुरों की टीका व्यर्थ होती है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को भगवान के परम व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया और गीता पर उसके अनुसार की गई कोई भी टीका इस विज्ञान के महान कार्य हेतु वास्तविक भक्ति है। किंतु, असुर भगवान कृष्ण को स्वरूपतः स्वीकार नहीं करते हैं। इसके बजाय वे कृष्ण के बारे में कुछ-न-कुछ मनगढ़ंत करके सामान्य पाठकों को कृष्ण की शिक्षा के मार्ग से भटकाते हैं। इस तरह के भ्रामक मार्गों के बारे में यहाँ चेतावनी दी गई है। अर्जुन द्वारा स्थापित शिष्य-परंपरा का अनुसरण करने का प्रयास करना चाहिए और इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के महान विज्ञान का लाभ उठाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥