ज्नानं परम-गुह्यं मे
यद् विज्ञान-समन्वितम्
स-रहस्यं तद्-अंगं च
गृहाण गदितं मया
“आत्म और परमात्मा का ज्ञान बहुत ही गोपनीय और रहस्यमय है, लेकिन इस तरह के ज्ञान और विशिष्ट प्राप्ति को समझा जा सकता है अगर खुद भगवान ने इसके विभिन्न पहलुओं के साथ समझाया हो।” भगवद-गीता में हमें आत्म के उस सामान्य और विशिष्ट ज्ञान के बारे में बताया गया है। जीव भगवान के अंश और भाग हैं, और इसलिए वे केवल भगवान की सेवा करने के लिए हैं। इस चेतना को कृष्ण चेतना कहा जाता है। इसलिए, जीवन की शुरुआत से ही मनुष्य को इस कृष्ण चेतना को सीखना होगा, और इस तरह से वह पूरी तरह से कृष्ण भावना से ओतप्रोत हो जाएगा और उसी के अनुसार कार्य करेगा।
काम वासना केवल भगवान के प्यार का विकृत प्रतिबिंब है जो हर जीव के लिए स्वाभाविक है। लेकिन अगर किसी को शुरू से ही कृष्ण चेतना में शिक्षित किया जाए, तो भगवान के उस स्वाभाविक प्रेम को कामेच्छा में बदलना संभव नहीं होगा। जब भगवान का प्रेम कामेच्छा में बदल जाता है, तो सामान्य स्थिति में लौटना बहुत मुश्किल होता है। बावजूद इसके, कृष्ण चेतना इतनी शक्तिशाली है कि देर से शुरुआत करने वाला भी भक्ति सेवा के नियमों का पालन करके भगवान का प्रेमी बन सकता है। इसलिए जीवन के किसी भी चरण से या उसकी तात्कालिकता को समझने के समय से, व्यक्ति कृष्ण चेतना में इंद्रियों को नियंत्रित करना और भगवान की सेवा अर्थात भक्ति सेवा करना शुरू कर सकता है, और कामेच्छा को भगवान के प्रेम में बदल सकता है - मानव जीवन का सर्वोच्च पूर्णता स्तर।
