भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व अपनी सदा बढ़ती आध्यात्मिक आनंद के लिए कई गुना खुद का विस्तार किया गया, और जीव उस आध्यात्मिक आनंद के अंश और पार्सल हैं। उनके पास भी आंशिक स्वतंत्रता है, लेकिन अपनी स्वतंत्रता के दुरुपयोग से, जब सेवा भाव इंद्रिय भोग की प्रवृत्ति में बदल जाता है, तो वे वासना के प्रभाव में आते हैं। यह भौतिक सृष्टि प्रभु द्वारा सशर्त आत्माओं को इन वासनात्मक प्रवृत्तियों को पूरा करने की सुविधा देने के लिए बनाया गया है, और जब लंबे वासनापूर्ण गतिविधियों से पूरी तरह से परेशान हो जाते हैं, तो जीव अपनी वास्तविक स्थिति के बारे में पूछताछ करना शुरू करते हैं।
यह पूछताछ वेदांत-सूत्रों की शुरुआत है, जिसमें कहा गया है, अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा: सर्वोच्च की पूछताछ करनी चाहिए। और सर्वोच्च को श्रीमद्-भागवतम में जनमादि अय यतोऽन्वयादितरताशचा के रूप में परिभाषित किया गया है, या "सब कुछ की उत्पत्ति सर्वोच्च ब्रह्म है।" इसलिए वासना की उत्पत्ति भी सर्वोच्च में है। इसलिए, यदि वासना सर्वोच्च के लिए प्यार में बदल जाती है, या कृष्ण चेतना में बदल जाती है - या, दूसरे शब्दों में, कृष्ण के लिए सब कुछ की इच्छा करना - तो वासना और क्रोध दोनों ही आध्यात्मिक हो सकते हैं। भगवान राम के महान सेवक हनुमान ने रावण की सुनहरी नगरी को जलाकर अपने क्रोध का प्रदर्शन किया, लेकिन ऐसा करके वे भगवान के सबसे बड़े भक्त बन गए। यहां भी, भगवद-गीता में, भगवान अर्जुन को भगवान की संतुष्टि के लिए अपने दुश्मनों पर क्रोध करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए, काम और क्रोध, जब वे कृष्ण चेतना में नियोजित होते हैं, तो हमारे दुश्मन के बजाय हमारे दोस्त बन जाते हैं।
