अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन, हे केशव, यदि आप सोचते हैं कि बुद्धि सकाम कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे इस घोर युद्ध में क्यों लगाना चाहते हैं?
Arjuna said, "O Janardana, O Kesava! If you consider wisdom to be superior to selfish action, then why do you want to engage me in this fierce battle?"
तात्पर्य
भगवान श्री कृष्ण ने पिछले अध्याय में आत्मा के संविधान का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है, ताकि अपने घनिष्ठ मित्र अर्जुन को भौतिक दुख के समुद्र से मुक्त कराया जा सके और उनके लिए बोधि-योग या कृष्ण भावना का मार्ग प्रशस्त किया गया है। कभी-कभी कृष्ण भावना को जड़ता के रूप में गलत समझा जाता है और इस तरह की गलतफहमी के साथ अक्सर व्यक्ति भगवान कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करके पूर्ण रूप से कृष्ण भावना प्राप्त करने के लिए एकांत स्थान पर चले जाते हैं। लेकिन कृष्ण भावना के दर्शनशास्त्र में प्रशिक्षित हुए बिना एकांत स्थान पर भगवान कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करना उचित नहीं है जहाँ से व्यक्ति केवल भोले-भाले जनमानस से सस्ती प्रशंसा अर्जित कर सकता है। अर्जुन ने भी कृष्ण भावना या बुद्धि-योग या आध्यात्मिक उन्नति में ज्ञान के रूप में सोचा जैसे कि सक्रिय जीवन और किसी एकांत स्थान पर तपस्या और कठोर साधना से सेवानिवृति करना। दूसरे शब्दों में, वह एक बहाने के रूप में कृष्ण भावना का उपयोग करके युद्ध से कुशलतापूर्वक बचना चाहते थे। लेकिन एक ईमानदार छात्र के रूप में, उन्होंने इस मामले को अपने गुरु के सामने रखा और कृष्ण से उनके सर्वोत्तम कार्य-पथ के बारे में पूछा। उत्तर में, भगवान कृष्ण ने इस तीसरे अध्याय में विस्तार से कर्म-योग या कृष्ण भावना में कार्य की व्याख्या की है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥