vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् भगवद्-गीता
»
अध्याय 18: संन्यास योग
»
श्लोक 44
श्लोक
18.44
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
अनुवाद
खेती, गोरक्षा और व्यापार वैश्यों के स्वाभाविक कार्य हैं, और शूद्रों के स्वाभाविक कार्य हैं श्रम और दूसरों की सेवा।
Agriculture, cow protection and trade are the natural duties of the Vaishyas and the duty of the Shudras is labour and service to others.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×