श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  15.19 
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भ‍जति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
जो कोई भी मुझे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में बिना किसी संदेह के जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है। इसलिए हे भरतपुत्र! वह मेरी पूर्ण भक्ति में लगा रहता है।
 
Anyone who knows me as the Supreme Personality of Godhead without any doubt is the knower of all. Therefore, O son of Bharata, that person is immersed in My complete devotion.
तात्पर्य
जीवित इकाइयों और सर्वोच्च निरपेक्ष सत्य की संवैधानिक स्थिति के बारे में कई दार्शनिक धारणाएँ हैं। अब इस श्लोक में सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जो कोई भी भगवान कृष्ण को सर्वोच्च व्यक्ति जानता है, वह वास्तव में सब कुछ जानने वाला है। अपूर्ण ज्ञानी केवल निरपेक्ष सत्य के बारे में अनुमान लगाता रहता है, लेकिन पूर्ण ज्ञानी, अपने मूल्यवान समय को बर्बाद किए बिना, सीधे कृष्ण चेतना में संलग्न होता है, जो सर्वोच्च भगवान की भक्तिमय सेवा है। भगवद-गीता के संपूर्ण भाग में, इस तथ्य पर हर कदम पर जोर दिया जा रहा है। और फिर भी भगवद-गीता पर बहुत से जिद्दी टीकाकार हैं जो सर्वोच्च निरपेक्ष सत्य और जीवित इकाइयों को एक ही मानते हैं। वैदिक ज्ञान को श्रुति कहा जाता है, श्रवण द्वारा सीखना। किसी को वास्तव में कृष्ण और उनके प्रतिनिधियों जैसे अधिकारियों से वैदिक संदेश प्राप्त करना चाहिए। यहाँ कृष्ण हर चीज़ को बहुत अच्छी तरह से अलग करते हैं, और किसी को इस स्रोत से सुनना चाहिए। सूअरों की तरह केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; व्यक्ति को अधिकारियों से समझने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि किसी को केवल शैक्षणिक रूप से अनुमान लगाना चाहिए। किसी को भगवद-गीता से विनम्रतापूर्वक यह सुनना चाहिए कि ये जीवित इकाइयाँ हमेशा सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान के अधीन होती हैं। सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान, श्री कृष्ण के अनुसार, जो कोई भी इसे समझने में सक्षम है, वह वेदों के उद्देश्य को जानता है; वेदों के उद्देश्य को कोई और नहीं जानता।

भजति शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। कई जगहों पर भजति शब्द का प्रयोग सर्वोच्च भगवान की सेवा के संबंध में किया गया है। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण कृष्ण चेतना में लगा हुआ है, भगवान की भक्तिमय सेवा में, तो यह समझना होगा कि वह सभी वैदिक ज्ञान को समझ चुका है। वैष्णव परंपरा में कहा गया है कि यदि कोई कृष्ण की भक्तिमय सेवा में लगा हुआ है, तो सर्वोच्च निरपेक्ष सत्य को समझने के लिए किसी अन्य आध्यात्मिक प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। वह पहले ही उस बिंदु पर आ चुका है, क्योंकि वह भगवान की भक्तिमय सेवा में लगा हुआ है। उसने समझने की सभी प्रारंभिक प्रक्रियाओं को समाप्त कर दिया है। लेकिन अगर कोई सैकड़ों हजारों जीवन के बाद भी अनुमान लगाता रहता है, तो इस मुकाम तक नहीं पहुँचता कि कृष्ण ही सर्वोच्च भगवान हैं और वहीं आत्मसमर्पण करना है, तो इतने वर्षों और जन्मों तक उसका सारा अनुमान समय की बर्बादी है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)