लोके शब्द का अर्थ है 'पौरुष आगम (स्मृति शास्त्र) में'। निर्वक्ति शब्दकोष ने इसे इस प्रकार निश्चित किया है- लोक्यते वेदार्थोऽनेन। अर्थात् वेदार्थ का प्रतिपादन स्मृति शास्त्र द्वारा ही होता है।
परमात्मा के अतिरिक्त रूप का वर्णन वेदों में भी है। वेदों (छान्दोग्य उपनिषद 8.12.3) का निम्नलिखित मंत्र है- तावदेष संप्रसादोऽस्माच्छरीरं संमुत्थाय परं ज्योतिरूपं संपाद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः। 'शरीर से निकल कर परमात्मा निराकार ब्रह्मज्योति को प्राप्त होते हैं, तत्पश्चात् साकार रूप में अपना वास्तविक रूप प्राप्त कर लेते हैं। उसे ही उत्तम पुरुष कहते हैं।' इसका तात्पर्य है कि वह उत्तम पुरुष अपने आध्यात्मिक प्रकाश का प्रदर्शन और विस्तार करते हैं। वह परम प्रकाश है। उस उत्तम पुरुष का परमात्मा रूप भी होता है। महाभारत में वह सत्यावती और पराशर के पुत्र के रूप में अवतार धारण करके व्यासदेव के रूप में वेद ज्ञान का प्रतिपादन करते हैं।
