श्रीमद् भगवद्-गीता  »  अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.34 
यथा प्रकाशयत्येक: कृत्स्‍नं लोकमिमं रवि: ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्‍नं प्रकाशयति भारत ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
हे भारतपुत्र! जिस प्रकार सूर्य ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार शरीर में स्थित जीवात्मा चेतना द्वारा सम्पूर्ण शरीर को प्रकाशित करता है।
 
O son of Bharata! Just as the Sun alone illuminates this entire universe, similarly the soul situated within the body illuminates the entire body with consciousness.
तात्पर्य
चेतना को लेकर विविध सिद्धांत विद्यमान हैं। यहाँ भगवद्गीता में सूर्य और धूप का उदाहरण दिया गया है। जिस तरह सूर्य एक ही स्थान पर स्थित होता है, लेकिन पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी तरह आत्मा का एक छोटा कण, यद्यपि इस शरीर के हृदय में स्थित होता है, अपने चेतन से पूरे शरीर को प्रकाशित करता है। अतः चेतना आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है, जिस तरह धूप या प्रकाश सूर्य की उपस्थिति का प्रमाण है। जब आत्मा शरीर में उपस्थित होता है, तो पूरे शरीर में चेतना होती है, और जैसे ही आत्मा शरीर से निकल जाता है, चेतना समाप्त हो जाती है। इसे कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आसानी से समझ सकता है। इसलिए चेतना पदार्थ के संयोजन का उत्पाद नहीं है। यह जीवित सत्ता का लक्षण है। जीवित सत्ता की चेतना, यद्यपि गुणात्मक रूप से परम चेतना के साथ एक है, परम नहीं है, क्योंकि किसी एक विशिष्ट शरीर की चेतना दूसरे शरीर की चेतना को साझा नहीं करती है। लेकिन परमात्मा, जो व्यक्तिगत आत्मा के मित्र के रूप में सभी शरीरों में स्थित होता है, सभी शरीरों के प्रति सचेत रहता है। परम चेतना और व्यक्तिगत चेतना के बीच यही अंतर है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)