समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २९ ॥
अनुवाद
जो व्यक्ति परमात्मा को सर्वत्र, प्रत्येक जीव में समान रूप से विद्यमान देखता है, वह अपने मन से स्वयं को पतित नहीं करता। इस प्रकार वह दिव्य लक्ष्य तक पहुँच जाता है।
A person who sees God present everywhere and in every living being equally does not corrupt himself through his mind. In this way, he attains his divine destination.
तात्पर्य
इस भौतिक अस्तित्व को स्वीकार कर जीवन-सत्ता अपनी आत्मिक सत्ता से भिन्न प्रकार से स्थित हो गई है। परंतु यदि कोई व्यक्ति यह समझ ले कि परमेश्वर सर्वत्र अपने परमात्मा विग्रह में स्थित है अर्थात् यदि कोई जीव मात्र में परमात्मा की उपस्थिति देख सके तो वह स्वयं को विध्वंंसकारी मानसिकता से पतित नहीं करता है और इस प्रकार वह धीरे-धीरे आत्मिक जगत में उन्नत होता जाता है। सामान्यतः मन इंद्रिय तृप्ति की प्रक्रिया में लिप्त रहता है परंतु जब मन परमात्मा की ओर मुड़ जाता है तो व्यक्ति आत्मिक समझ में उन्नत होता जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥