श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 9: गोपीनाथ पट्टनायक का उद्धार  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  3.9.151 
चैतन्य - चरित्र एइ परम गम्भीर ।
सेइ बुझे, ताँर पदे याँर मन ‘धीर’ ॥151॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के उद्देश्य इतने गहन हैं कि उन्हें कोई तभी समझ सकता है जब उसे भगवान के चरणकमलों की सेवा में पूर्ण विश्वास हो।
 
The sentiments of Sri Chaitanya Mahaprabhu are so profound that one can understand them only when one has complete devotion in serving the lotus feet of Mahaprabhu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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