श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 8: रामचन्द्र पुरी द्वारा महाप्रभु की आलोचना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  3.8.78 
पर - स्वभाव - कर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् ।
विश्वमे कात्मकं पश्यन्प्रकृत्या पुरुषेण च ॥78॥
 
 
अनुवाद
"हमें यह देखना चाहिए कि प्रकृति और जीव के मिलन के कारण ही यह ब्रह्मांड समरूप रूप से कार्य कर रहा है। इसलिए हमें दूसरों के गुणों या कार्यों की न तो प्रशंसा करनी चाहिए और न ही आलोचना।"
 
"One should see that the universe functions by its very nature as a result of the union of material nature and living entities. Therefore, one should neither praise nor criticize the nature or actions of others."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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