श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.7.95 
सङ्कटे पड़िल पण्डित, करये संशय ।
कि करिबेन , - एको, करिते ना पारे निश्चय ॥95॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पंडित गोसांई दुविधा में पड़ गए। वे इतने संशय में थे कि अकेले निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि क्या करें।
 
Pandit Gosain was thus caught in a dilemma. He was so confused that he found it difficult to decide what to do.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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