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अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट
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श्लोक 93
श्लोक
3.7.93
दैन्य क रि’ कहे, - “निलुँ तोमार शरण ।
तुमि कृपा करि’ राख आमार जीवन” ॥93॥
अनुवाद
वल्लभ भट्ट ने बड़ी विनम्रता से उनके पास जाकर कहा, "महाराज, मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे प्राण बचाएँ।"
Approaching him with utmost humility, Vallabh Bhatta said, "Sir, I have taken refuge in you. Please be kind to me and save my life."
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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