श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  3.7.87 
“एइ अर्थ आमि मात्र जानिये निर्धार ।
आर सर्व - अर्थे मोर नाहि अधिकार” ॥87॥
 
 
अनुवाद
"मैं इन दो नामों को निश्चित रूप से जानता हूँ, श्यामसुंदर और यशोदानन्दन। मैं इनके अलावा कोई अन्य अर्थ नहीं समझता, न ही मुझमें इन्हें समझने की क्षमता है।"
 
"I know these two names for sure: Shyamsundar and Yashodanandan. I do not understand any other meaning, nor do I have the capacity to understand them."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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