श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.7.57 
भट्ट कहे , - “ए सब वैष्णव रहे कोन् स्थाने? ।
कोन् प्रकारे पाइमु इहाँ - सबार दर्शने ?” ॥57॥
 
 
अनुवाद
वल्लभ भट्ट ने कहा, "ये सभी वैष्णव कहाँ रहते हैं, और मैं उन्हें कैसे देख सकता हूँ?"
 
Vallabha Bhatta said, “Where do all these Vaishnavas live and how can I see them?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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