श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.7.56 
प्रभुर मुखे वैष्णवता शुनिया सबार ।
भट्टेर इच्छा हैल ताँ - सबारे देखिबार ॥56॥
 
 
अनुवाद
जब वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से इन सभी भक्तों के शुद्ध वैष्णवत्व के बारे में सुना, तो उन्हें तुरंत उनसे मिलने की इच्छा हुई।
 
When Vallabha Bhatta heard from the mouth of Sri Chaitanya Mahaprabhu about the pure Vaishnavism of all these devotees, he immediately desired to have darshan of them all.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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