श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.7.55 
भट्टेर मनेते एइ छिल दीर्घ गर्व ।
प्रभुर वचन शुनि’ से हइल खर्व ॥55॥
 
 
अनुवाद
ऐसा अभिमान वल्लभ भट्ट के मन में बहुत समय से था, किन्तु जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश सुना, तो उनका अभिमान नष्ट हो गया।
 
Such pride had been lingering in Vallabha Bhatta's mind for a long time, but when he heard the teachings of Sri Chaitanya Mahaprabhu, his pride was shattered.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)