श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.7.45 
ऐश्वर्य - ज्ञान हैते केवला - भाव - प्रधान ।
पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव - समान ॥45॥
 
 
अनुवाद
"ऐश्वर्यमय कृष्ण-प्रेम से सर्वथा भिन्न, शुद्ध कृष्ण-प्रेम सर्वोच्च स्तर पर है। इस जगत में उद्धव से बड़ा कोई भक्त नहीं है।"
 
Pure love of Krishna is completely different from love of Krishna in its opulence and occupies the highest position. There is no devotee on this earth greater than Uddhava.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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