श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.7.41 
गोपी - गणेर शुद्ध - प्रेम ऐश्वर्य - ज्ञान - हीन ।
प्रेमेते भर्त्सना करे एइ तार चिह्न ॥41॥
 
 
अनुवाद
"शुद्ध प्रेम में लीन, ऐश्वर्य के ज्ञान से रहित, गोपियाँ कभी-कभी कृष्ण को डाँटती हैं। यह शुद्ध आनंदमय प्रेम का लक्षण है।"
 
"The gopis, overcome by pure love, devoid of any knowledge of opulence, sometimes rebuke Krishna. This is a sign of pure love."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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