श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.7.40 
यत्ते सुजात - चरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भमति धीर्भवदायुषां नः ॥40॥
 
 
अनुवाद
"हे प्रियतम! आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें अपने वक्षस्थलों पर धीरे से रखते हैं, इस भय से कि कहीं आपके चरणों में चोट न लग जाए। हमारा जीवन केवल आपमें ही निहित है। इसलिए हमारे मन में यह चिन्ता रहती है कि कहीं वन-पथ पर विचरण करते समय आपके कोमल चरणों में कंकड़-पत्थर न लग जाएँ।"
 
"O beloved, your feet are so delicate that we fearfully place them gently on our breasts, fearing that they might be hurt. Our lives depend solely on you. Therefore, our hearts are anxious that your feet might be injured by pebbles while wandering through the forest."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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