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श्लोक 3.7.39  |
‘शुद्ध - प्रेम’ व्रज - देवीर - काम - गन्ध - हीन।
‘कृष्ण - सुख - तात्पर्य’, - एइ तार चिह्न ॥39॥ |
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| अनुवाद |
| "गोपियों और श्रीमती राधारानी का निष्काम प्रेम भौतिक वासना से रहित है। ऐसे दिव्य प्रेम की कसौटी यह है कि उसका एकमात्र उद्देश्य कृष्ण को संतुष्ट करना है।" |
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| "The pure love of the gopis and Srimati Radharani is devoid of even a trace of material lust. The test of such transcendental love is that its sole purpose is to satisfy Krishna." |
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