श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.7.38 
दामोदर - स्वरूप - ‘प्रेम - रस’ मूर्तिमान् ।
याँर सङ्गे हैल व्रज - मधुर - रस - ज्ञान ॥38॥
 
 
अनुवाद
"परमानंद प्रेम की दिव्य मधुरता स्वरूप दामोदर द्वारा साक्षात की गई है। उनकी संगति से मैंने वृंदावन के दाम्पत्य प्रेम की दिव्य मधुरता को समझा है।"
 
The divine essence of love is embodied by Damodar. Through his company, I have understood the divine sweetness of Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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