श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.7.37 
कहन ना याय रामानन्देर प्रभाव ।
राय - प्रसादे जानि लुँ व्रजेर ‘शुद्ध’ भाव ॥37॥
 
 
अनुवाद
रामानन्द राय के प्रभाव और ज्ञान का वर्णन करना असंभव है, क्योंकि केवल उनकी कृपा से ही मैंने वृन्दावनवासियों के अनन्य प्रेम को समझा है।
 
It is impossible to describe the influence and knowledge of Ramanand Rai, because it was only through his grace that I could understand the pure love of the people of Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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