श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.7.36 
ए सब शिखाइला मोरे राय - रामानन्द ।
अनर्गल रस - वेत्ता प्रेम - सुखानन्द ॥36॥
 
 
अनुवाद
"रामानंद राय दिव्य मधुरता के प्रति अत्यंत सजग हैं। वे कृष्ण के परमानंद प्रेम के आनंद में निरंतर लीन रहते हैं। उन्होंने ही मुझे यह सब सिखाया है।"
 
"Ramananda Rai is well versed in the divine essences. He is constantly absorbed in the bliss of Krishna's love. He taught me all this."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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