श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.7.35 
ऐश्वर्य देखिलेह ‘शुद्धेर’ नहे ऐश्वर्य ज्ञान ।
अतएव ऐश्वर्य हइते ‘केवल’ - भाव प्रधान ॥35॥
 
 
अनुवाद
"यदि कोई शुद्ध भक्त कृष्ण के ऐश्वर्य को देख भी ले, तो भी वह उसे स्वीकार नहीं करता। इसलिए शुद्ध चेतना भगवान के ऐश्वर्य की चेतना से अधिक श्रेष्ठ है।"
 
"Even if a pure devotee sees Krishna's opulence, he does not accept it. Therefore, pure consciousness (mere feeling) is superior to knowledge of the Lord's opulence."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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