श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.7.29 
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त - रतेः प्रसादः स्वर्योषि तां नलिन - गन्ध - रुचां कुतोऽन्याः ।
रासोत्सवेऽस्य भुज - दण्ड - गृहीत - कण्ठ - लब्धाशिषां य उदगाद्व्रज - सुन्दरीणाम् ॥29॥
 
 
अनुवाद
“जब भगवान श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तब भगवान ने गोपियों को अपने गले में बाँहों में भर लिया था। यह दिव्य कृपा लक्ष्मी या आध्यात्मिक जगत की अन्य पत्नियों को कभी प्राप्त नहीं हुई। न ही स्वर्ग की परम सुंदरी कन्याओं ने कभी ऐसी कल्पना की थी, जिनकी शारीरिक कांति और सुगंध कमल पुष्पों के सौंदर्य और सुगंध के समान थी। और सांसारिक स्त्रियों की तो बात ही क्या, जो भौतिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर हो सकती हैं?’
 
"When Lord Krishna danced with the gopis in the Rasa Lila, the Lord's arms embraced their necks. This divine grace was never received by Lakshmiji, nor by the other beloveds in Vaikuntha. Even the most beautiful women of heaven, whose bodies radiate and smell like lotus flowers, never imagined such grace. So what about worldly women, who are considered extremely beautiful by physical estimation?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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