श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.7.28 
‘आत्म - भूत’ - शब्दे कहे ‘पारिषद - गण’ ।
ऐश्वर्य - ज्ञाने लक्ष्मी ना पाइला व्रजेन्द्र - नन्दन ॥28॥
 
 
अनुवाद
“आत्म-भूत’ शब्द का अर्थ है ‘व्यक्तिगत सहयोगी’। भगवान के ऐश्वर्य को समझकर, भाग्य की देवी नंद महाराज के पुत्र कृष्ण की शरण प्राप्त नहीं कर सकीं।
 
The word ‘ātmabhūta’ means ‘personal companion.’ Knowledge of the Lord’s opulence prevented Lakṣmījī from seeking refuge with Nanda Mahārāja’s son.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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