श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.7.26 
‘ऐश्वर्य - ज्ञान - युक्त’, ‘केवल’ - भाव आर ।
ऐश्वर्य - ज्ञाने ना पाइ व्रजेन्द्र - कुमार ॥26॥
 
 
अनुवाद
"भाव दो प्रकार का होता है। भगवान के सम्पूर्ण ऐश्वर्य को जानने वाला भाव ऐश्वर्य-ज्ञान-युक्त कहलाता है, और शुद्ध, अदूषित भाव केवल कहलाता है। महाराज नंद के पुत्र कृष्ण के चरणकमलों की शरण केवल उनके ऐश्वर्य को जानकर नहीं प्राप्त की जा सकती।
 
"There are two types of devotion. That which is imbued with the knowledge of the Lord's full opulences is called knowledge of opulence. And pure, untainted devotion is called only. Simply knowing the opulences of Krishna, the son of Maharaja Nanda, cannot lead to the refuge of His lotus feet."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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