श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.7.25 
दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार ।
दास, सखा, गुरु, कान्ता , - ‘आश्रय’ याहार ॥25॥
 
 
अनुवाद
“सेवक, मित्र, श्रेष्ठ और दाम्पत्य प्रेमी, दास्य, सख्य, वात्सल्य और श्रृंगार नामक दिव्य प्रेम के आश्रय हैं।
 
Slaves, friends, teachers and lovers are the abodes of the sentiments of servitude, friendship, affection and romance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)