श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.7.22 
तेंह देखाइला मोरे भक्ति - योग - पार ।
ताँर प्रसादे जानि लुँ ‘कृष्ण - भक्ति - योग’ सार ॥22॥
 
 
अनुवाद
"सार्वभौम भट्टाचार्य ने मुझे भक्ति की सीमा बताई है। उनकी कृपा से ही मैं समझ पाया हूँ कि कृष्ण भक्ति ही समस्त योग का सार है।
 
"Sarvabhauma Bhattacharya has shown me the limits of devotion. It is only through his grace that I have been able to understand that devotion to Krishna is the essence of all yoga."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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