श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.7.20 
नित्यानन्द - अवधूत - ‘साक्षातीश्वर’ ।
भावोन्मादे मत्त कृष्ण - प्रेमेर सागर ॥20॥
 
 
अनुवाद
"अवधूत भगवान नित्यानन्द प्रभु भी साक्षात् भगवान हैं। वे सदैव परमानंद प्रेम के उन्माद में मग्न रहते हैं। निःसंदेह, वे कृष्ण प्रेम के सागर हैं।"
 
Nityanand Prabhu Avadhoot is also the Supreme Personality of Godhead. They always remain crazy in the frenzy of love. Undoubtedly, He is an ocean of Krishna-love.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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