vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री चैतन्य चरितामृत
»
लीला 3: अन्त्य लीला
»
अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट
»
श्लोक 17
श्लोक
3.7.17
अद्वैताचार्य - गोसाञि - ‘साक्षातीश्वर’ ।
ताँर सङ्गे आमार मन हइल निर्मल ॥17॥
अनुवाद
“फिर भी, मेरा मन शुद्ध हो गया है क्योंकि मैंने अद्वैत आचार्य की संगति की है, जो साक्षात् भगवान हैं।
“Yet my mind has become pure because I have associated with Advaita Acharya, who is God Himself.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×