श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  3.7.165 
चैतन्य - प्रभुर लीला के बुझिते पारे? ।
एक - लीलाय वहे गङ्गार शत शत धारे ॥165॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को कोई नहीं समझ सकता। वे गंगा के समान हैं, क्योंकि उनकी एक लीला से ही सैकड़ों-हजारों शाखाएँ निकलती हैं।
 
No one can understand the pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu. He is like the Ganges, for from one of His pastimes flow hundreds of thousands of branches.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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