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श्लोक 3.7.156  |
“तुमि केने आसि’ ताँरे ना दिला ओलाहन ? ।
भीत - प्राय ह ञा काँहे करिला सहन ?” ॥156॥ |
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| अनुवाद |
| "तुमने उसे फटकार कर बदला क्यों नहीं लिया? तुम उसकी आलोचना को डरते हुए क्यों सहन करते रहे?" |
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| "Why didn't you rebuke them? Why did you fearfully endure their criticism?" |
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