श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  3.7.156 
“तुमि केने आसि’ ताँरे ना दिला ओलाहन ? ।
भीत - प्राय ह ञा काँहे करिला सहन ?” ॥156॥
 
 
अनुवाद
"तुमने उसे फटकार कर बदला क्यों नहीं लिया? तुम उसकी आलोचना को डरते हुए क्यों सहन करते रहे?"
 
"Why didn't you rebuke them? Why did you fearfully endure their criticism?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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