श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  3.7.150 
पण्डितेर ठाञि चाहे मन्त्रादि शिखिते ।
पण्डित कहे , - “एइ कर्म नहे आमा हैते” ॥150॥
 
 
अनुवाद
वल्लभ भट्ट गदाधर पंडित से दीक्षा लेना चाहते थे, लेकिन गदाधर पंडित ने यह कहते हुए मना कर दिया कि, "आध्यात्मिक गुरु के रूप में कार्य करना मेरे लिए संभव नहीं है।
 
Vallabha Bhatta wanted to take initiation from Gadadhara Pandita, but Gadadhara Pandita refused saying, “It is not possible for me to act as a guru.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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