श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.7.15 
सन्त्ववतारा बहवः पुष्कर - नाभस्य सर्वतो - भद्राः ।
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेम - दो भवति ॥15॥
 
 
अनुवाद
“भगवान के अनेक सर्वमंगलमय अवतार हो सकते हैं, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त कौन शरणागत आत्माओं पर भगवत्प्रेम प्रदान कर सकता है?”
 
“There may be many all-auspicious incarnations of God, but who other than Lord Krishna can bestow divine love on those who surrender to Him?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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