श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  3.7.144 
गदाधर - पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव ।
रुक्मिणी - देवीर यैछे दक्षिण - स्वभाव ॥144॥
 
 
अनुवाद
गदाधर पंडित का श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति शुद्ध और आनंदमय प्रेम भी अत्यंत गहन था। यह रुक्मिणीदेवी के समान था, जो सदैव कृष्ण के प्रति विशेष रूप से समर्पित रहती थीं।
 
Gadadhara Pandita also had a very intense pure love for Sri Chaitanya Mahaprabhu. This love was like that of Rukmini Devi, who was always humble towards Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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