श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  3.7.143 
बार - बार प्रणय कलह करे प्रभु - सने ।
अन्योऽन्ये खट्मटि चले दुइ - जने ॥143॥
 
 
अनुवाद
जगदानंद पंडित भगवान के साथ प्रेमपूर्ण झगड़ों को भड़काने के आदी थे। उनके बीच हमेशा कुछ न कुछ मतभेद रहता था।
 
Jagadananda Pandit had a habit of lovingly quarreling with Mahaprabhu. There was always some kind of conflict between them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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