श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  3.7.134 
श्रीधर - उपरे गर्वे ये किछु लिखिबे ।
‘अर्थ - व्यस्त’ लिखन सेइ, लोके ना मानिबे ॥134॥
 
 
अनुवाद
"श्रीधर स्वामी से आगे निकलने की कोशिश में, मिथ्या अभिमान के कारण तुम जो कुछ भी लिखोगे, उसका अर्थ विपरीत होगा। इसलिए कोई उस पर ध्यान नहीं देगा।"
 
"Whatever you write out of false pride, trying to be superior to Sridhar Swami, it will have the opposite meaning. Therefore, no one will pay any attention to it."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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