श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.7.127 
तुमि - ईश्वर, निजोचित कृपा ये करिला ।
अपमान क रि’ सर्व गर्व खण्डाइला ॥127॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय प्रभु, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। आपने मेरे सारे मिथ्या अभिमान को चूर करने के लिए मेरा अपमान करके मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि से कृपा की है।
 
"O Lord, You are the Supreme Personality of Godhead. You have shown me mercy befitting Your position by insulting me and shattering all my false pride."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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