द्वापरीयैर्जनेर्विष्णुः पंचरात्रैस्तु केवलैः
कलौ तु नाम-मात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः
"द्वापर युग में कृष्ण या विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पांचरात्रिक परंपरा के अनुसार भव्य अनुष्ठान की जरूरत होती थी, पर कलियुग में भगवान हरि को केवल उनके पवित्र नाम का जाप करके संतुष्ट किया जा सकता है और उनकी पूजा की जा सकती है।" श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर बताते हैं कि यदि कृष्ण की अप्रकट करुणा से किसी को प्रत्यक्ष रूप से शक्ति न मिली हो तो वह पूरे संसार का आध्यात्मिक गुरु (जगदगुरु) नहीं बन सकता। एवम कोई केवल दिमागी कल्पना के बल पर आचार्य नहीं बन सकता। सच्चा आचार्य पूरे संसार में भगवान का पवित्र नाम का प्रचार करके सभी के सामने कृष्ण को प्रस्तुत करता है। इस तरह, पवित्र नाम का जाप करने से शुद्ध हुई बद्ध आत्माएं भौतिक अस्तित्व की प्रज्वलित अग्नि से मुक्त हो जाती हैं। इस तरह, आध्यात्मिक लाभ आकाश में बढ़ते चंद्रमा की तरह निरंतर पूर्ण होते जाते हैं। सच्चे आचार्य और पूरे संसार के आध्यात्मिक गुरु को कृष्ण की करुणा का अवतार माना जाना चाहिए। वास्तव में, वह व्यक्तिगत रूप से कृष्ण को गले लगाते हैं। अतः वह सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) और सभी आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) के आध्यात्मिक गुरु हैं। चूंकि उन्हें सबसे अधिक उन्नत भक्त माना जाता है, इसलिए उन्हें परमहंस-ठाकुर कहा जाता है। ठाकुर परमहंस को दिए जाने वाला सम्मान का खिताब है। इसलिए जो आचार्य के रूप में कार्य करता है, अपने नाम और प्रसिद्धि के प्रसार से भगवान कृष्ण को सीधे प्रस्तुत करता है, उसे भी परमहंस-ठाकुर कहा जाना चाहिए।
