श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  3.7.115 
प्रभु हासि’ कहे, - “स्वामी ना माने येइ जन ।
वेश्यार भितरे तारे करिये गण न” ॥115॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "जो स्वामी [पति] को अधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं करता, मैं उसे वेश्या मानता हूँ।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu replied with a smile, “I consider a person who does not consider his master (husband) as his authority, to be a prostitute.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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