श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  3.7.114 
“सेइ व्याख्या करेन याहाँ येइ पड़े आनि ।
एक - वाक्यता नाहि, ताते ‘स्वामी’ नाहि मानि” ॥114॥
 
 
अनुवाद
"श्रीधर स्वामी जो कुछ भी पढ़ते हैं, उसकी व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार करते हैं। इसलिए उनकी व्याख्या असंगत है और उन्हें प्रामाणिक नहीं माना जा सकता।"
 
"Sridhar Swami interprets whatever he reads according to the circumstances. Therefore, his interpretations are inconsistent and cannot be considered authoritative."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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