श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 7: श्री चैतन्य महाप्रभु एवं वल्लभ भट्ट की भेंट  »  श्लोक 112
 
 
श्लोक  3.7.112 
आर दिन आ सि’ वसिला प्रभुरे नमस्करि’ ।
सभाते कहेन किछु मने गर्व करि’ ॥112॥
 
 
अनुवाद
अगले दिन जब वह श्री चैतन्य महाप्रभु की सभा में आया, तो भगवान को प्रणाम करके बैठ गया और बड़े गर्व के साथ कुछ कहा।
 
The next day when he came to the assembly of Sri Chaitanya Mahaprabhu, he greeted Mahaprabhu, sat down and started saying something with great pride.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)